डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन : भारत में हरित क्रांति के जनक
भूमिका
भारत के स्वतंत्रता पश्चात् इतिहास में यदि किसी वैज्ञानिक का योगदान सबसे निर्णायक माना जाता है तो वह डॉ. मनकोम्बु संबासिवन स्वामीनाथन हैं। उन्हें विश्वभर में "भारत की हरित क्रांति के जनक" (Father of Indian Green Revolution) के रूप में जाना जाता है। उनका जीवन इस बात का सजीव उदाहरण है कि कैसे विज्ञान और नीति का संगम किसी राष्ट्र की दिशा बदल सकता है। 1960 के दशक में जब भारत खाद्यान्न संकट और अकाल की स्थिति से जूझ रहा था, तब स्वामीनाथन के नेतृत्व में किए गए अनुसंधान एवं सुधारों ने देश को आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर किया।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
डॉ. स्वामीनाथन का जन्म 7 अगस्त 1925 को तमिलनाडु के कुंभकोणम में हुआ। उनके पिता डॉ. एम.के. सांबसिवन एक प्रसिद्ध सर्जन और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े व्यक्ति थे, जबकि माता पार्वती थंगम्मल धार्मिक और पारंपरिक पृष्ठभूमि से थीं। बचपन में ही पिता का निधन हो जाने से परिवार आर्थिक संकट में आया, परंतु इससे स्वामीनाथन का हौसला कम नहीं हुआ।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा कुंभकोणम और त्रिची में प्राप्त की। पहले वे चिकित्सा क्षेत्र में जाना चाहते थे, किंतु 1942-43 के बंगाल अकाल ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने निश्चय किया कि जीवन का लक्ष्य किसानों और भूखों की सेवा विज्ञान के माध्यम से करना होगा।
स्वामीनाथन ने मद्रास विश्वविद्यालय से प्राणीशास्त्र की डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने कोयंबटूर कृषि कॉलेज से कृषि विज्ञान का अध्ययन किया। आगे वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (यूके) गए और आनुवंशिकी (Genetics) में पीएच.डी. प्राप्त की। अमेरिका और नीदरलैंड में उन्होंने उन्नत अनुसंधान किया और पौधों की ठंड व रोग-प्रतिरोधी किस्मों पर कार्य किया।
प्रेरणा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
1940 के दशक के अकाल ने स्वामीनाथन की वैज्ञानिक सोच को मानवीय दृष्टि दी। उन्होंने कहा था —
“यदि विज्ञान का लाभ खेत और किसान तक नहीं पहुँचे तो वह अधूरा है।”
यही सोच उन्हें कृषि अनुसंधान से नीति निर्माण की ओर ले गई। वे मानते थे कि विज्ञान केवल उत्पादकता नहीं, बल्कि पोषण सुरक्षा, सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय संतुलन का साधन होना चाहिए।
कैरियर और प्रमुख योगदान
भारतीय कृषि अनुसंधान में भूमिका
- 1954 में वे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली में साइटोजेनेटिक्स विभाग से जुड़े।
- उन्होंने अर्ध-बौनी (Semi-dwarf) किस्मों पर शोध शुरू किया।
- उन्होंने मैक्सिको के कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोर्लॉग के साथ संपर्क कर उच्च उपज वाली गेहूं की किस्में भारत में लाने की पहल की।
- 1960 के दशक में पंतनगर, लुधियाना, कानपुर और दिल्ली जैसे केंद्रों पर इन किस्मों का परीक्षण हुआ और भारत में उनकी सफलता ने इतिहास बदल दिया।
हरित क्रांति (Green Revolution)
भारत में 1965-70 के बीच हरित क्रांति के बीज बोए गए। इस क्रांति में तीन प्रमुख स्तंभ थे:
- उच्च उपज वाली किस्में (HYVs) – गेहूं और चावल की नई किस्में।
- आधुनिक कृषि तकनीक – उर्वरक, सिंचाई, कीटनाशक और वैज्ञानिक प्रबंधन।
- नीतिगत समर्थन – न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), सहकारी संस्थाएँ और अनाज खरीद नीति।
स्वामीनाथन की अगुवाई में गेहूं उत्पादन 1965 में 12 मिलियन टन से बढ़कर 1972 तक 23 मिलियन टन तक पहुँच गया। भारत, जो पहले अमेरिका से PL-480 कार्यक्रम के अंतर्गत अनाज आयात करता था, कुछ ही वर्षों में आत्मनिर्भर बन गया।
प्रशासनिक और नीतिगत योगदान
- ICAR के महानिदेशक (1972-79): इस दौरान उन्होंने कृषि अनुसंधान को विकेंद्रीकृत किया और छोटे किसानों तक तकनीक पहुँचाने पर जोर दिया।
- राष्ट्रीय कृषि आयोग के सदस्य: यहाँ उन्होंने कृषि नीति और खाद्य सुरक्षा को वैज्ञानिक आधार देने में योगदान दिया।
- राष्ट्रीय किसान आयोग (2004-06): इसके अध्यक्ष के रूप में उन्होंने MSP को उत्पादन लागत से 50% अधिक करने की सिफारिश की। यह आज भी किसान आंदोलनों का मुख्य आधार है।
- सदाबहार क्रांति (Evergreen Revolution): उन्होंने हरित क्रांति को पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए यह नया मॉडल प्रस्तुत किया, जिसमें उत्पादकता वृद्धि और पारिस्थितिक संतुलन साथ-साथ हों।
- M.S. Swaminathan Research Foundation (MSSRF): 1988 में स्थापित इस संस्था ने जैव विविधता, सूचना प्रौद्योगिकी, तटीय संसाधन प्रबंधन और ग्रामीण महिला सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण काम किया।
पुरस्कार और सम्मान
डॉ. स्वामीनाथन को जीवनकाल में असंख्य पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए। प्रमुख हैं:
- पद्मश्री (1967), पद्मभूषण (1972), पद्मविभूषण (1989)
- रामन मैग्सेसे पुरस्कार (1971)
- अल्बर्ट आइंस्टीन विश्व विज्ञान पुरस्कार (1986)
- वर्ल्ड फूड प्राइज (1987) – वे इसके पहले प्राप्तकर्ता थे।
- वोल्वो पर्यावरण पुरस्कार (1999)
- संयुक्त राष्ट्र का पहला "Earth Hall of Fame Kyoto Prize"
- 2007 में उन्हें राज्यसभा के लिए नामित सदस्य बनाया गया।
विचारधारा और दृष्टिकोण
डॉ. स्वामीनाथन का मानना था कि “भूख मिटाने के लिए उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे समान रूप से वितरित करना भी आवश्यक है।”
- उन्होंने Evergreen Revolution का विचार दिया, जो उत्पादन वृद्धि और पर्यावरणीय संरक्षण का संतुलन है।
- वे जैव विविधता और पारंपरिक किस्मों के संरक्षण के समर्थक थे।
- उन्होंने महिलाओं और ग्रामीण समुदायों को कृषि नवाचारों का केंद्र बनाने पर बल दिया।
- वे कहते थे कि “कृषि सिर्फ जीविका नहीं, बल्कि संस्कृति है।”
निधन और विरासत
डॉ. स्वामीनाथन का निधन 28 सितंबर 2023 को 98 वर्ष की आयु में चेन्नई में हुआ। उनके जाने से कृषि विज्ञान की दुनिया ने एक महान मार्गदर्शक खो दिया।
उनकी विरासत आज भी जीवित है:
- MSSRF (एम एस स्वामीनाथन रिसर्च फाउडेशन) के माध्यम से वे ग्रामीण भारत में परिवर्तन ला रहे हैं।
- किसान आयोग की सिफारिशें आज भी प्रासंगिक हैं।
- उनके विचारों ने भारत ही नहीं, बल्कि एशिया और अफ्रीका के कई देशों की कृषि नीति को प्रभावित किया।
डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन का जीवन विज्ञान और समाज की सेवा का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने अकालग्रस्त भारत को खाद्य आत्मनिर्भर राष्ट्र में बदल दिया। वे केवल "हरित क्रांति के जनक" नहीं, बल्कि "सदाबहार क्रांति के सूत्रधार" भी हैं। उनका योगदान यह संदेश देता है कि विज्ञान तब तक अधूरा है जब तक उसका लाभ अंतिम किसान और अंतिम भूखे व्यक्ति तक न पहुँचे।
आज जलवायु परिवर्तन, जल संकट और पोषण असुरक्षा की चुनौतियों के बीच स्वामीनाथन की सोच और भी प्रासंगिक है।



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