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भारत के नौवें प्रधानमंत्री श्री पी. वी. नरसिंह राव की जीवनी

श्री पी. वी. नरसिंह राव : भारत के आर्थिक उदारीकरण के शिल्पी

भूमिका

पामुलापर्ति वेंकट नरसिंह राव (P. V. Narasimha Rao) भारतीय राजनीति के ऐसे नेता रहे जिन्होंने भारत की दिशा और दशा को बदल दिया। उन्हें प्रायः भारत के आर्थिक सुधारों का जनक (Father of Indian Economic Reforms) कहा जाता है। 1991 में जब भारत भीषण आर्थिक संकट से गुजर रहा था, तब प्रधानमंत्री राव के नेतृत्व और उनके द्वारा चुने गए वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की नीतियों ने देश को नए युग की ओर अग्रसर किया। उनकी राजनीतिक कुशलता, प्रशासनिक दक्षता और दूरदर्शिता ने भारत को वैश्वीकरण की राह पर डाला।





प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

पी. वी. नरसिंह राव का जन्म 28 जून 1921 को आंध्र प्रदेश के करीमनगर ज़िले के लक्ष्मणगिरि गाँव (वर्तमान तेलंगाना) में हुआ। वे एक मध्यमवर्गीय कृषक परिवार से थे। उनके माता-पिता का नाम पामुलापर्ति राघवराव और रुक्मिणम्मा था।

राव ने प्राथमिक शिक्षा गाँव में प्राप्त करने के बाद हैदराबाद और नागपुर में पढ़ाई की। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से स्नातक और विधि (LLB) की डिग्री प्राप्त की। विद्यार्थी जीवन से ही वे राजनीति, साहित्य और समाज सेवा में रुचि रखते थे।

वे एक बहुभाषाविद् थे और 12 से अधिक भाषाएँ जानते थे जिनमें हिंदी, तेलुगु, मराठी, संस्कृत, अंग्रेज़ी, स्पैनिश, जर्मन और फ्रेंच शामिल थीं। साहित्य, अनुवाद और लेखन में भी उनकी गहरी रुचि थी।


स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी

राव ने 1930 और 1940 के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। हैदराबाद राज्य के निज़ाम के शासन में लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग और ‘हैदराबाद मुक्ति आंदोलन’ में उन्होंने हिस्सा लिया।


राजनीतिक जीवन की शुरुआत

स्वतंत्रता के बाद राव कांग्रेस पार्टी से जुड़े।

  • 1957 में पहली बार आंध्र प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए।
  • 1962 में आंध्र प्रदेश के मंत्री बने और शिक्षा, कृषि व कानून विभाग संभाले।
  • 1971 से 1973 तक वे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। उनके कार्यकाल में भूमि सुधार और शिक्षा के विस्तार के लिए प्रयास किए गए।
  • बाद में उन्हें केंद्र सरकार में विभिन्न मंत्रालय जैसे विदेश, रक्षा और गृह मंत्रालय संभालने का अवसर मिला।

प्रधानमंत्री बनने की परिस्थितियाँ

1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस पार्टी को करिश्माई नेतृत्व की आवश्यकता थी। बहुमत न होने पर भी कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी और नरसिंह राव को प्रधानमंत्री बनाया गया। वे कांग्रेस से जुड़े पहले नेता थे जो नेहरू-गांधी परिवार से बाहर से प्रधानमंत्री बने।




प्रधानमंत्री कार्यकाल (1991–1996)

उनका कार्यकाल भारतीय इतिहास में निर्णायक मोड़ साबित हुआ।

1. आर्थिक सुधार

जब राव प्रधानमंत्री बने तब भारत पर विदेशी मुद्रा भंडार संकट, भुगतान संतुलन की समस्या और राजकोषीय घाटा बढ़ा हुआ था।

  • उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया।
  • 1991 में नई आर्थिक नीति (Liberalization, Privatization, Globalization – LPG) लागू की गई।
  • औद्योगिक लाइसेंसिंग खत्म की गई (License Raj समाप्त)।
  • विदेशी निवेश (FDI) और तकनीक को प्रोत्साहन मिला।
  • आयात शुल्क घटाए गए और निर्यात को बढ़ावा दिया गया।
  • सार्वजनिक क्षेत्र में सुधार की नींव रखी गई।

इन सुधारों ने भारत को आत्मनिर्भरता और बंद अर्थव्यवस्था से निकालकर वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाया।

2. विदेश नीति

  • राव ने लुक ईस्ट पॉलिसी (Look East Policy) शुरू की, जिससे एशियाई देशों से भारत के आर्थिक संबंध मज़बूत हुए।
  • उन्होंने अमेरिका, यूरोप और एशिया के साथ रणनीतिक संबंधों को बढ़ावा दिया।
  • 1992 में इज़राइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए।
  • रूस (पूर्व सोवियत संघ) के बिखरने के बाद नए भू-राजनीतिक समीकरण में भारत को संतुलित रूप से स्थापित किया।

3. विज्ञान और प्रौद्योगिकी

  • सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार के क्षेत्र में सुधारों की शुरुआत उन्हीं के कार्यकाल में हुई।
  • उन्होंने वैज्ञानिक संस्थाओं और आईटी सेक्टर को प्रोत्साहित किया, जो आगे चलकर भारत की शक्ति बना।

4. आंतरिक राजनीति और विवाद

  • 1992 में उनके शासनकाल में अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस हुआ। इसे रोक पाने में उनकी विफलता उनकी छवि पर बड़ा धब्बा माना जाता है।
  • विपक्ष ने उन पर निष्क्रियता और ढिलाई का आरोप लगाया।
  • उनके शासनकाल में कई राजनीतिक घोटाले भी चर्चा में आए, जैसे झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड

आलोचना

  • आलोचकों का मानना है कि वे करिश्माई नेता नहीं थे और कांग्रेस पार्टी को एकजुट रखने में कठिनाई हुई।
  • आर्थिक सुधारों से असमानता बढ़ने और ग्रामीण भारत की अनदेखी के आरोप भी लगे।
  • बाबरी मस्जिद प्रकरण ने उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को प्रभावित किया।

साहित्यिक और बौद्धिक योगदान

राव केवल राजनेता ही नहीं बल्कि लेखक, अनुवादक और विचारक भी थे।

  • उन्होंने कई ग्रंथों का अनुवाद किया, जिनमें व्यास की महाभारत का आधुनिक तेलुगु अनुवाद प्रसिद्ध है।
  • अंग्रेज़ी में उनका उपन्यास The Insider भारतीय राजनीति पर आधारित है।
  • साहित्य और भाषाओं में उनकी गहरी रुचि ने उन्हें भारतीय राजनीति में “पंडित प्रधानमंत्री” की छवि दी।

निधन और विरासत

पी. वी. नरसिंह राव का निधन 23 दिसंबर 2004 को नई दिल्ली में हुआ। दुर्भाग्यवश, उन्हें कांग्रेस पार्टी और विशेषकर गांधी परिवार से अपेक्षित सम्मान नहीं मिला।

हालांकि समय बीतने के साथ उनकी भूमिका को ऐतिहासिक मान्यता मिली। 2020 में उनकी जन्मशती वर्ष पर केंद्र और तेलंगाना सरकार ने उन्हें औपचारिक श्रद्धांजलि दी।

पी. वी. नरसिंह राव भारतीय राजनीति के सबसे कम आंके गए किंतु सबसे प्रभावशाली प्रधानमंत्रियों में से एक थे। उन्होंने यह साबित किया कि बिना करिश्माई छवि के भी दूरदर्शिता, व्यावहारिकता और दृढ़ नीतियों के बल पर राष्ट्र को बदला जा सकता है।
उनकी सबसे बड़ी विरासत आर्थिक सुधार है, जिसने भारत को 21वीं सदी के वैश्विक शक्ति बनने की नींव दी। इस दृष्टिकोण से वे एक संक्रमणकालीन नेता थे जिन्होंने परंपरागत अर्थव्यवस्था से आधुनिक उदारीकृत अर्थव्यवस्था की ओर भारत का मार्ग प्रशस्त किया।
















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